बुधवार, 18 दिसंबर 2024

नेहरू और माउंटबेटन के सामने शपथ समारोह: भारत की स्वतंत्रता का ऐतिहासिक क्षण

15 अगस्त 1947 को भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्रता प्राप्त की, और यह दिन भारतीय इतिहास का सबसे ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण दिन बन गया। इस दिन ने भारतीय राजनीति, समाज और इतिहास में एक नया अध्याय लिखा। स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, और यह शपथ समारोह केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि एक नई शुरुआत का प्रतीक था। इस लेख में हम इस शपथ समारोह के महत्व और उसके पीछे की घटनाओं पर नजर डालेंगे, जिसमें लॉर्ड लुईस माउंटबेटन की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी।

1. 15 अगस्त 1947: एक नया सूर्योदय

15 अगस्त 1947 को जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, तो यह दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लंबी और कठिन यात्रा का अंत था। इसके साथ ही भारत को एक नई दिशा मिल रही थी, जो एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में दुनिया में अपनी पहचान स्थापित करेगा। इस दिन ने भारत की लाखों नफरत, संघर्ष और बलिदान के बाद स्वतंत्रता प्राप्त की। यह दिन सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि यह भारतीय जनमानस के लिए आत्मसम्मान और स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया।

2. लॉर्ड लुईस माउंटबेटन का शपथ समारोह में योगदान

लॉर्ड लुईस माउंटबेटन, जो उस समय भारत के अंतिम ब्रिटिश वायसराय थे, ने पंडित नेहरू को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई। माउंटबेटन का कार्यकाल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम क्षणों में था, जब ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत को स्वतंत्रता देने का निर्णय लिया। माउंटबेटन को वायसराय के रूप में नियुक्त किया गया था, और उनका मुख्य कार्य भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को सुचारू रूप से संपन्न कराना था।

माउंटबेटन के कार्यकाल में भारत का विभाजन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान का निर्माण हुआ। विभाजन की प्रक्रिया और इसके दौरान हुई हिंसा और विस्थापन पर माउंटबेटन की भूमिका को लेकर आज भी चर्चा होती है, लेकिन उनके नेतृत्व में ही भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की।

3. पंडित नेहरू का उद्घाटन भाषण: एक प्रेरणादायक संदेश

नेहरू ने शपथ ग्रहण के बाद "तोड़ने की रात" (Midnight Speech) के नाम से प्रसिद्ध उद्घाटन भाषण दिया, जो आज भी भारतीय राजनीति में एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने कहा, "आज रात जब हम स्वतंत्रता प्राप्त कर रहे हैं, तो यह केवल एक नई सुबह का स्वागत है, न केवल हमारे लिए, बल्कि हमारे भविष्य के लिए भी। हमें यह सुनिश्चित करना है कि हमारी स्वतंत्रता का पालन पूरे देश में समान रूप से किया जाए"

यह भाषण भारतीयों के लिए एक नई उम्मीद और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। नेहरू के शब्दों में एक ऐसी ताकत थी, जो लाखों भारतीयों को प्रेरित करती थी और उन्हें स्वतंत्र भारत के निर्माण में भागीदार बनने के लिए प्रोत्साहित करती थी।

4. भारत की स्वतंत्रता का वैश्विक महत्व

नेहरू और माउंटबेटन के सामने शपथ समारोह का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं था। यह दिन एक वैश्विक घटना बन गया, क्योंकि भारत की स्वतंत्रता ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का अंत हो चुका है। भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति प्राप्त की और दुनिया में एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई।

भारत की स्वतंत्रता ने एशिया और अफ्रीका के अन्य देशों को भी प्रेरित किया, जो अपने-अपने देशों में स्वतंत्रता संग्राम चला रहे थे। यह दिन उपनिवेशी शासन के अंत की शुरुआत थी, और भारत ने दुनिया को यह दिखा दिया कि संघर्ष, धैर्य और समर्पण से बड़ी से बड़ी दीवारें भी गिराई जा सकती हैं।

5. नेहरू और माउंटबेटन के बीच संबंध

नेहरू और माउंटबेटन के बीच का संबंध भी महत्वपूर्ण था, हालांकि यह संबंध औपचारिक था, लेकिन दोनों के बीच सहयोग की भावना थी। माउंटबेटन ने स्वतंत्रता प्राप्ति के समय नेहरू का समर्थन किया और भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में उनके मार्गदर्शन में कार्य किया। माउंटबेटन ने नेहरू को कई मामलों में सलाह दी और सत्ता हस्तांतरण के दौरान उन्हें सहयोग दिया।

हालांकि माउंटबेटन को लेकर विवाद भी थे, खासकर विभाजन और उसकी प्रतिक्रिया को लेकर, फिर भी उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उनके निर्णयों ने भारतीय राजनीति और इतिहास को गहरे रूप से प्रभावित किया।

6. निष्कर्ष

15 अगस्त 1947 का दिन भारतीय इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ था, जब भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति पाई और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई। इस दिन का शपथ समारोह केवल एक औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह हमारे देश के लिए एक नए युग की शुरुआत थी। पंडित नेहरू और माउंटबेटन के बीच यह शपथ समारोह भारतीय राजनीति और इतिहास का एक अहम हिस्सा है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष और बलिदान को याद दिलाता है।

नेहरू का उद्घाटन भाषण आज भी भारतीयों के दिलों में जीवित है, और माउंटबेटन की भूमिका ने स्वतंत्रता संग्राम की इस अद्भुत यात्रा को नया दिशा दी। 15 अगस्त 1947 की सुबह ने भारत को न केवल स्वतंत्रता दी, बल्कि उसे एक नया रास्ता दिखाया, जिस पर आगे बढ़ते हुए भारत ने दुनिया में अपनी पहचान बनाई।    

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